Bhagwat Vandana: Chalisa
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Wednesday, April 29, 2020

शिव चालीसा (Shiv Chalisa)
April 29, 20200 Comments


शिव चालीसा


दोहा

जय गणेश गिरिजासुवन, मंगल मूल सुजान
कहत अयोध्यादास तुम, देउ अभय वरदान

चौपाई

जय शिव शङ्कर औढरदानी। 
जय गिरितनया मातु भवानी॥

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। 
सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥

सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। 
उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥

पराशक्ति - पति अखिल विश्वपति। 
परब्रह्म परधाम परमगति॥

सर्वातीत अनन्य सर्वगत। 
निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥

अंगभूति - भूषित श्मशानचर। 
भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥

वृषवाहन नंदीगणनायक। 
अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥

व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। 
रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥

कर त्रिशूल डमरूवर राजत। 
अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम। 
पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर। 
गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी। 
बने सृजन-पालन-लयकारी॥

तुम हो नित्य दया के सागर। 
आशुतोष आनन्द-उजागर॥

अति दयालु भोले भण्डारी। 
अग-जग सबके मंगलकारी॥

सती-पार्वती के प्राणेश्वर। 
स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥

हरि-हर एक रूप गुणशीला। 
करत स्वामि-सेवक की लीला॥

रहते दोउ पूजत पुजवावत। 
पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही। 
रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥

जग-जित घोर हलाहल पीकर। 
बने सदाशिव नीलकं� वर॥

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। 
असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। 
तिनको शिव अति करत परमहित॥

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी। 
ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥

अर्जुन संग लडे किरात बन। 
दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥

भक्तन के सब कष्ट निवारे। 
दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥

शङ्खचूड जालन्धर मारे। 
दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥

अन्धकको गणपति पद दीन्हों। 
शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। 
बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय। 
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। 
अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥

काशी मरत जंतु अवलोकी। 
देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥

भक्त भगीरथ की रुचि राखी। 
जटा बसी गंगा सुर साखी॥

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी। 
ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। 
शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। 
देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥

अति उदार करुणावरुणालय। 
हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥

तुम्हरो भजन परम हितकारी। 
विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। 
ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥

भेदशून्य तुम सबके स्वामी। 
सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥

जो जन शरण तुम्हारी आवत। 
सकल दुरित तत्काल नशावत॥

|| दोहा ||

बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार।
गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार॥

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय।
तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार।
कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥

कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र।
राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥
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Wednesday, December 26, 2018

SRI RAM CHALISA
December 26, 20180 Comments


श्री रघुबीर भक्त हितकारी।सुनि लीजै प्रभुअरज हमारी॥
निशि दिन ध्यानधरै जो कोई।ता सम भक्तऔर नहीं होई॥
ध्यान धरें शिवजीमन मांही। ब्रह्मा, इन्द्र पार नहींपाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना।जासु प्रभाव तिहुंपुर जाना॥
जय, जय, जयरघुनाथ कृपाला। सदा करोसंतन प्रतिपाला॥

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Saturday, August 25, 2018

हनुमान साठिका
August 25, 20180 Comments

हनुमान साठिका
जय जय जय हनुमान अडंगी। महावीर विक्रम बजरंगी।।
जय कपीस जय पवन कुमारा। जय जगबन्दन सील अगारा।।
जय आदित्य अमर अविकारी। अति मरदन जय-जय गिरधारी।।
अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा। जय जयकार देवतन कीन्हा।।
बाजे दुंदुभि गगन गम्भीरा। सुर मन हर्ष असुर मन पीरा।।
कपि के डर गढ़ लंक सकानी। छूटे बंध देवतन जानी।।
द्धषि समूह निकट चलि आये। पवन तनय के सिर पद नाये।।
बार बार अस्तुति करि नाना। निर्मल नाम धरा हनुमाना।।
सकल द्धषिन मिलि अस मत ठाना। दीन्ह बताय लाल फल खाना।।
सुनत बचन कपि मन हर्षाना। रवि रथ उदय लाल फल जाना।।
रथ समेत कपि कीन्ह अहारा। सूर्य बिना भए अति अंधियारा।।
विनय तुम्हार करै अकुलाना। तब कपीस की अस्तुति टाना।।
सकल लोक वृतान्त सुनावा। चतुरानन तब रवि उगिलावा।।
कहा बहोरि सुनहु बलसीला। रामचन्द्र करिहैं बहु लीला।।
तब तुम उन्हकर करेहू सहाई। अबहिं बसहु कानन में जाई।।
अस कहि विधि निजलोक सिधारा। मिले सखा संग पवन कुमारा।।
खेलैं खेल महा तरु  तोरैं।  ढेर करै बहु पर्वत फोरैं।
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई। गिरि समेत पातालहिं आई।।
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा।  निरखनित रहे राम मगु आसा।।
मिले रा तहँ पवन कुमार। अति आनन्द सप्रेम दुलारा।।
मनि मुँदरी रघुपति सों पाई। सीता खोज चले सिरु नाई।।
सतयोजन जलनिधि विस्तारा। अगम अपार देवतन हारा।।
जिमि सुर गोखुर सरिस कपीसा। लांघि गये कपि कहि जगदीशा।।
सीता चरण सीस तिन्ह नाये। अजर अमर के आसीस पाये।।
रहे दनुज उपवन रखवारी। एक से एक महाभट मारी।।
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा। देहउ लंक कोप्यो भुज बीसा।।
सिया बोध है पुनि फिर आये। रामचन्द्र के पद सिर नाये।।
मेरु उपारि आप छिन माहीं। बांधे संतु निमिष इक माही।।
लछमन शक्ति लागी उर जबरीं। राम बुलाय कहा पुनि तबहीं।।
भवन समेत सुषेन लै आये।  तुरत सजीवन को पुनि धाये।।
मग महं कालनेमि कहँ मारा। अमित सुभट निसिचर मँहारा।।
आनि सजीवन गिरि समेता। धरि दीन्हों जहँ कृपा-निकेता।। फनपति केर सो हरि लीन्हा। बर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा।।
अहिरावण हरि अनुज समेता। लै गयो तहाँ पाताल निकेता।।
जहाँ रहे देवी अस्थाना। दीन चहैं बालि काढ़ि कृपाना।।
पवनतनय प्रभु कीन गुहारी। कटक समेत निसाचर मारी।।
रीच कसपति सबै बहोही। राम लषन कीन यह ठोरी।।
सब देवतन की बन्दी छुड़ाये। सो कीरति मुनि नारद गाये।।
अछय कुमार दनुज बलवाना। कालकेतु कहँ सब जग आना।।
कुम्भकरण रावण का भाई। ताहि पात कीन्ह कपिराई।।
मेघनाद पर शक्ति मारा। पवन तनय तब सो बरियारा।।
महा तनय नारन्तक जाना। पल में हते ताहि हनुमाना।।
जहं लगि मान दनुज कर पावा। पवन तनय सब मारि नसावा।।
जय मारुत सुत जय अनुकूला। नाम कृसानु सोक सम तुला।।
जहं जीवन के संकट होई। रवि तम सम सो संकट खोई।।
बन्दी परै सुमिरै हनुमाना। संकट कटै धरै जो ध्याना।।
जाको बाधे बामपद दीन्हा। मारुतसु व्याकुल बहु कीन्हा।।
सो मुजबल का कीन कृपाला। अच्छत तुम्हें मोर यह हाला।।
आरत हरन नाम हनुमाना। सादर सुरपति कीन बखाना।।
संकट रहै न एक रती को। ध्यान धरै हनुमान जती को।।
धावहु देखि  दीनता मोरी। कहौं पवनसुत जुगकर जोरी।।
कपिपति बेगि अनुग्रह करहू। आतुर आइ दुसह दुःख  हरहू।।
राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया। जवन गुहार लाय सिय जाया।।
यश तुम्हार सकल जग जाना। भव बंधन भंजन हनुमाना।।
यह बंधन कर केतिक  बाता। नाम तुम्हार जगत सुखदाता।।
करो कृपा जय जय जग स्वामी। बार अनेक नमामी नमामी।।
भौमवार कर होम विघ्ना। धूप दीप नैवेद्य सुजाना।।
मंगलदायक को लौ लावे। सुर नर मुनि वांछित फल पावे।।
जयति जयति जय जय स्वामी। समरत पुरुष सुर अन्तरजामी।।
अंजनी तय नाम हनुमाना। सो तुलसी के प्राण समाना।।
दोहा – जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण।।
बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण।।
जो नित पढै यह साठिका, तुलसी कहै बिचारि।
रहैं न संकट ताहि को, साक्षी है त्रिपुरारी।।


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@Bhagwat Vandana